आदमी तेरी कितनी औकात है

अक्सर मैंने लोगों को छोटी छोटी बातों पर ये बोलते सुना है कि, तू मुझे बाहर मिल तेरी औकात बताता हूँ, तेरी औकात क्या है मेरे आगे, तू है कौन मेरे आगे क्या औकात है तेरी, तो मेरे उन भाइयो और बहनो के लिए मेरी इस कविता के माध्यम से एक संदेश है, कि इस पूरे ब्रह्मांड मे जितने भी प्राणी हैं वो सभी की खुद मे एक महत्ता है, देखा जाए तो इस पूरे ब्रह्मांड मे आदमी की कोई औकात नहीं है., और समाज के कुछ रूढ़िवादी सोच रखने वाले लोगों के लिए भी यह कविता मैंने लिखी.

आदमी तेरी कितनी औकात है!
है तेरे पास बंगला गाड़ी कार,
पर भिखारी को एक टका तक देने में
तू कर देता इंकार,
बता आदमी तेरी कितनी औकात है!!

करता है तू पत्थर पूजा
दिए जलाता सुबह शाम
पर गरीब को ना दिया सहारा
जाकर देख जो पड़े हैं
सड़कों पर सरेआम!
बता आदमी तेरी कितनी औकात है!!

बेटियों से तू कहता
मत करना हमारी इज़्ज़त के साथ मज़ाक
पर बेटों को क्यों नहीं बताता
मत कर किसी के घर की इज़्ज़त के साथ खिलवाड़
बेटियों से कहता हरदम ये करो वो करो
कहा होता अगर यही बेटों को
तो ना करता कोई बेटा किसी बेटी का अपमान!
बता आदमी तेरी कितनी औकात है!!

जिस लड़की को तू देता प्रेम का नाम
ज़माने में फिर कर देता उसी को बदनाम!
बेटा करे प्रेम तो तू कहता बेटा बड़ा हो रहा है
अगर पड़ गयी बेटी प्रेम में
तो तू कहता बेटी बिगड़ रही है
अरे अब तो आँखे खोल तू क्यों है सच से अंजान
यही सोच है जो बताती है तेरी क्या है औकात!
बता आदमी तेरी कितनी औकात है!!

खुद को कहता है तू मर्दों की शान
स्त्री पर कर अत्याचार बता तेरी क्या है औकात!
बेटा बेटा करने वाले जिनका बढ़ता मान
ज़रा सोच तू खुद है एक बेटी की संतान!
बता आदमी तेरी कितनी औकात है!!

लिंग के आधार पर जो लोग करते भेदभाव
बेटों को कहते करो नौकरी
बेटियों का शादी के नाम पर कर देते मोलभाव!
बता आदमी तेरी कितनी औकात है!!

छोटा बड़ा ऊंच नीच कला गोरा करने वाला
तू खुद को समझता महान
सब कुछ है तेरे पास
पर अफसोस मर गया तेरे अंदर का इंसान!
बता आदमी तेरी कितनी औकात है!!

ओहदा दौलत शोहरत से
समाज मे तू कमाता है सम्मान
पर गरीब तड़पता है
कहाँ गया तेरे अंदर का इंसान!
बता आदमी तेरी कितनी औकात है!!

ना पुलिस ना डॉक्टर ना इंजीनियर
ना कर अपने पद पर अहंकार
पर पहले तू बनकर दिखा एक इंसान!
बता आदमी तेरी कितनी औकात है!!

महलों में बैठा दिन रात
तू लेता अलग अलग आहार
पर तू है खामोश
और एक रोटी के टुकड़े मे
कोई जी रहा अपना संसार!
बता आदमी तेरी कितनी औकात है!!

संपत्ति पर अपनी
तू करता रहता अभिमान
पर देख ज़रा
एक छोटे से आशियाना में
कोई ढूंढ रहा अपना जहां!
बता आदमी तेरी कितनी औकात है!!

कौन छोटा कौन बड़ा तू मत कर हिसाब
तेरा हिसाब करने के लिए
ऊपर बैठा है भगवान!
बता आदमी तेरी कितनी औकात है!!

क्यों है अखिर समाज हमारा पुरुष प्रधान
जब लिया जाता है जनक से पहले जननी का नाम
मैं फिर कहती हूं तू मत कर अभिमान
तू क्या चीज है
जो खाली हाँथ गया वो सिकंदर महान!
 बता आदमी तेरी कितनी औकात है!!

कभी सोचा है ये ब्रह्मांड कितना बड़ा है?
ब्रह्मांड में आकाशगंगा कितनी बड़ी है?
आकाशगंगा में पृथ्वी कितनी बड़ी है?
पृथ्वी पर ये दुनिया कितनी बड़ी है ?
दुनिया मे देश, देश मे शहर, शहर मे नगर
नगर मे घर कितना बड़ा है?
घर में आदमी कितना बड़ा है?
देख आदमी तेरी इतनी सी औकात!
इंसान ही लेलेता इंसान के प्राण,
बता आदमी तेरी कितनी औकात है!! 







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