कौन है वो आखिर??

आकर पास मेरे वो चुपके से
 कान में धीरे से कुछ कह कर जाता है
 देखती हूं जब इधर उधर उसको 
तो पल में ही गायब हो जाता है!
 कौन है वो आखिर
 मेरे करीब इतना आकर
  जो हाल में ही दूर हो जाता है!!

कुछ जानी पहचानी महक सी लगती है उसमें
कदमों की आहट कुछ पहचानी सी लगती है उसमें
यूं तो इस  भीड़ भरी दुनिया में कैसे पहचाने हम किसको
मगर औरों से हटकर कुछ अलग बात लगती है उसमें!
 वो अक्सर कुछ कहकर जाता है
कौन है वो आखिर ?
जो औरों के लिए हमेशा कुछ कर जाता है!!


पंछी की तरह कभी उड़कर आता है वो
देखा है भेदभाव मैंने इंसानों में
पर किसी भी डाल पर बैठ जाता है वो!
त्याग बलिदान व दया की मूर्ति जैसा है
कौन है वो आखिर ?
जो इंसानों में इंसानियत सिखा जाता है!!


लोगों की विपदा में उसको
 फरिश्ता बनते देखा है, मगर
इंसानों की बस्ती में रहकर उसको
 इंसान बनते देखा है!
वो कभी साथ  छोड़कर नहीं जाता
कौन है वो आखिर ?
जो नादान को नदी के उस छोर तक ले जाता है!!

क्या वो कोई कविता के जैसा है
 जिसे लिखा जा सके,
है क्या कोई कहानी वो
जिसे पढ़ा जा सके!
महसूस किया है उसको
बिना देखे इतना,
कि उसके बारे में और क्या कहा जा सके!!

वो भी जलता है यहां
 उस सूरज की तरह,
रोशन रहता है उस चांद की तरह
मगर वो भी हर रोज ढल जाता है!
कौन है वह आखिर?
देकर रोशनी सबको
खुद अंधेरे में रह जाता है!!




भीड़ में हमेशा वो मौन रहता है
पर आईने में देख अक्सर खुद से  कुछ कहता  है!!
रोते हुये के आंसू पोंछ देता है!
कौन है वह आखिर?
करता है सब कुछ
पर बिन बताए चला जाता है!!

   मिट्टी की सौगंध खाने के लिए वो तैयार रहता है
   क्या रहता है वो आसमानों में,
मगर मुझे इस धरती का वो अंश लगता है!
सबको देकर हंसी वो खुश हो लेता है,
कौन है वो आखिर?
सबको मुस्कुराहट देकर,
खुद को अक्सर तन्हा पाता है!!

  वो चुपके से आकर लोगों का भला कर जाता है
  लोगों के लिए इतनी कुर्बानियां दे जाता है!
वो दिखता तो नहीं
पर देखने को उसको जी करता है
कौन है वो आखिर?
जो निस्वार्थ भाव से इतना कुछ कर जाता है!!



  क्या कोई असुरों का संहार है वो!
  या निर्धनों का संसार है वो ?
  साईं जी का द्वार है वो!
  क्या कृष्णा का विस्तार है वो?
  या ब्रह्मांड का सार है वो!
कौन है वो आखिर?
देने जिंदगी उसको हमेशा चला आता है!!







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